राधा मंगल-मालती, सरस मधुब्रत स्याम।
जमुना-तट राजत सदा, रसिक-सँजीवनि-धाम॥
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (90)
परम-हितकारी श्रीराधा मालती के फूल के समान हैं, जिनके रस का पान करने के लिए श्यामसुन्दर भ्रमर के सामान सदा मंडराते रहते हैं। श्री धाम वृन्दावन में यमुना के तट पर सदा सुशोभित रहने वाली यह युगल जोड़ी रसिकों का जीवन-प्राण है।
जमुना-तट राजत सदा, रसिक-सँजीवनि-धाम॥
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (90)
परम-हितकारी श्रीराधा मालती के फूल के समान हैं, जिनके रस का पान करने के लिए श्यामसुन्दर भ्रमर के सामान सदा मंडराते रहते हैं। श्री धाम वृन्दावन में यमुना के तट पर सदा सुशोभित रहने वाली यह युगल जोड़ी रसिकों का जीवन-प्राण है।

