किशोरी तोरी किरपा को आधार - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (118)

किशोरी तोरी किरपा को आधार - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (118)

(राग हिंडोल व आसावरी)
किशोरी तोरी किरपा को आधार।
बाट निहारू पल छिन येही, दरशै रूप अपार॥ [1]
रसना नाम रटै निशिवासर, विनवत बारम्बार।
उर उमाह नित रहत मिलन को, सब साधन दिये डार॥ [2]
बाँह गहै की लाज राखियो, श्रीवृषभान कुमार।
“रूपमाधुरी” श्रीसतगुरु ने, करी तुम्हारी लार॥ [3]

- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (118)

हे किशोरी जी (श्री राधा)! मेरे जीवन का एकमात्र आधार आपकी अहैतुकी कृपा ही है; मैं प्रतिपल इसी आस में आपकी बाट जोहता हूँ कि कब आपके अपार रूप-सौंदर्य के दर्शन होंगे। [1]

मेरी जिह्वा दिन-रात केवल आपके ही नाम की रट लगाती रहती है और मैं आपसे बार-बार यही विनय करता हूँ। आपसे मिलने के लिए मेरे हृदय में नित्य एक नया उत्साह बना रहता है, जिसके कारण मैंने अन्य सभी साधनों को पूरी तरह से त्याग दिया है। [2]

हे श्री वृषभानु नंदिनी! अब अपने इस शरणागत जीव की लाज रखना। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि मेरे परम कृपालु श्री सद्गुरुदेव ने मुझे आपके चरणों में समर्पित कर आपकी शरण दिला दी है। [3]