तेरौ मुख पीयूष पंक प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (20)

तेरौ मुख पीयूष पंक प्यारी - श्री रामराय जी, आदिवाणी (20)

तेरौ मुख पीयूष पंक प्यारी प्रघटे तामें द्वै इन्दीवर।
मेरौ मन मत्त मधुप सो जाय, वस्यैौ पुतरी है तिन अन्तर॥ [1]
रस लोभी एक सौं अनेक भयौ, तौहू न तृपति मानत रस कन्दर।
श्रीरामराय पुनि कपोल दल तिल, वन्यौ मस्तक स्याम विन्दीवर॥ [2]

- श्री रामराय जी, आदिवाणी (20)

श्री कृष्ण कहते हैं—
हे प्यारी श्रीराधे! आपका मुख अमृतमय सरोवर के समान है और उसमें आपके दोनों नेत्र दो नीलकमलों के समान प्रकट हो रहे हैं। मेरा मन मतवाले भ्रमर के समान होकर उन दोनों नीलकमल रूपी नेत्रों में जा बसा है, यहाँ तक कि वह उनकी पुतलियों के भीतर ही निवास करने लगा है। [1]

आपके रूप-रस का लोभी मेरा एक मन उस रस का आस्वादन करने के लिए मानो अनेक रूपों में विभक्त हो गया है, फिर भी इस रस की खान से उसकी तृप्ति नहीं होती। श्रीरामराय जी कहते हैं कि वही मन फिर आपके कपोल पर तिल बनकर और मस्तक पर श्याम बिन्दी बनकर सुशोभित हो गया है, मानो वह आपके रूप के प्रत्येक स्थान पर बसकर निरन्तर उसका रस लेना चाहता हो। [2]