पिय तेरी चितबन ही में - गोस्वामी श्री हरिराय जी

पिय तेरी चितबन ही में - गोस्वामी श्री हरिराय जी

(राग बिहाग)
पिय तेरी चितबन ही में टौना।
तन मन धन बिसरयौ जब ही तें, निरख्यौ बदन सलौना॥ [1]
ढिंग रहिवे कों होत बिकल मन, भावत नाँहिन भौना।
लोग चबाव करत घर-घर प्रति, धरि रहियै जिय मौना॥ [2]
छूटी लोक-लाज सुत पति की, और कहा अब हौना।
‘रसिक प्रीतम‘ की बानिक निरखत, भूलि गई गृह गौना॥ [3]

- गोस्वामी श्री हरिराय जी

हे प्रियतम! तुम्हारी चितवन में ही कोई अद्भुत जादू है। जब से मैंने तुम्हारे इस लावण्यमयी सुंदर मुख के दर्शन किए हैं, तब से मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ भूल गई हूँ। [1]

अब मेरा मन सदा तुम्हारे समीप रहने के लिए व्याकुल रहता है और मुझे कहीं भी घूमना अच्छा नहीं लगता। भले ही लोग घर-घर में भाँति-भाँति की निंदा-चर्चा करें, किंतु मैंने अपने मन में मौन धारण कर लिया है। [2]

तुम्हारे अनुराग में मेरी लोक-लाज तथा पुत्र-पति आदि का मोह भी छूट गया है, अब इससे अधिक और क्या होना है। गोस्वामी श्री हरिराय जी कहते हैं कि रसिक शिरोमणि प्रियतम श्यामसुन्दर की इस सुंदर छवि को देखते ही मैं अपना घर-संसार की सारी सुध-बुध भूल गई हूँ। [3]