जीवन तुम बिनु व्यर्थ है - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (12)

जीवन तुम बिनु व्यर्थ है - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (12)

जीवन तुम बिनु व्यर्थ है, प्यारे चतुर सुजान।
यासों तो मरिबो भलौ, तपत ताप तें प्रान॥

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (12)

हे प्यारे, चतुर और सुजान प्रियतम, श्री कृष्ण! तुम्हारे बिना यह जीवन ही व्यर्थ है। तुम्हारे वियोग में प्राण निरन्तर विरह की अग्नि में तपते रहें, इससे तो प्राणों का विसर्जन होना ही श्रेष्ठ है।