यहीं तो थी कभी ऋषि - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (20)

यहीं तो थी कभी ऋषि - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (20)

(कवित्त)
यहीं तो थी कभी ऋषि सौभरि की तपोभूमि,
पास में मिली हुई यमुना की सतह से। [1]
कलित कदम्ब तरे राज रहे केशव के,
छोटे छोटे मंजु पद कंज की तरह से॥ [2]
देखो खड़ा निर्भय सहस्त्र फणि मण्डल पै,
मन्द मन्द मुरली बजाता हुआ ठह से। [3]
नाथ लाया कालीनाग होता अनुमान यही,
कूद के कन्हैया आया अभी कालीदह से॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (20)

यह श्री धाम वृन्दावन की वही पावन भूमि है जहाँ कभी महर्षि सौभरि की तपोभूमि थी और जो यमुना जी के तट से सटकर स्थित थी। [1]

जहाँ सुंदर कदम्ब वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण के कमल-समान छोटे-छोटे सुकोमल चरण-कमल सुशोभित हो रहे हैं। [2]

देखो! वे सहस्र फणों वाले कालिय नाग के फण-मण्डल पर निर्भय होकर खड़े हैं और वहीं मन्द-मन्द मधुर मुरली बजा रहे हैं। [3]

आज भी यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि श्री कृष्ण अभी-अभी कालीदह के अगाध जल में कूदकर कालिया नाग का दमन करके बाहर आए हैं। [4]