रस ही सों तरु ठाढ़े - ब्रज के कवित्त

रस ही सों तरु ठाढ़े - ब्रज के कवित्त

(कवित्त)
रस ही सों तरु ठाढ़े, रस ही सों पात हरे,
रस ही सों फूल भरे रस ही जिवायो है। [1]
रस ही सों फल भावै, रस ही सों जल भावै,
रस ही सों अन्न भावै, रस सार गायो है॥ [2]
रस हो सों रूप भले, रस ही सों बोल भले,
रस ही की गारी भली, रस ही लुभायो है। [3]
रस ही आनन्द रूप, रस की सूरति अनूप,
'रसौ वै सः' श्याम वेदन में गायो है॥ [4]

- ब्रज के कवित्त

इस संसार में वृक्ष केवल रस के प्रभाव से ही सीधे खड़े हैं, उनके पत्ते रस के कारण ही हरे-भरे हैं, वे फूलों से लदे हुए हैं और इस रस ने ही संपूर्ण प्रकृति को जीवन प्रदान किया है। [1]

रस के कारण ही फल अत्यंत स्वादिष्ट लगते हैं, रस से ही जल प्रिय लगता है और रस के कारण ही अन्न रुचिपूर्ण भाता है, इसी रस को समस्त तत्वों का मुख्य सार गाया गया है। [2]

रस के कारण ही रूप-सौंदर्य भला प्रतीत होता है, रस से ही मधुर वाणी प्रिय लगती है और प्रेममयी गालियाँ भी रस के कारण ही सुहावनी लगती हैं, इस रस ने ही सबको अपनी ओर आकर्षित किया हुआ है। [3]

रस ही साक्षात् आनंद का स्वरूप है और इस रस की सुंदर छवि अत्यंत अनुपम है, इसीलिए वेदों में भी भगवान श्रीकृष्ण को 'रसो वै सः' (साक्षात रस स्वरूप ही है) कहकर गान किया गया है। [4]