आह्लादिनीत्वात् राधैव रसं वर्द्धयते सदा।
मत्स्यकूर्मावतारेषु रस-वार्तापि दुर्लभा॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (8)
भगवान और भक्त दोनों को आनन्द प्रदान करने वाली आह्लादिनी होने के कारण, श्रीराधा ही सदा रस की वृद्धि करती हैं। मत्स्य एवं कच्छप आदि अवतारों के समय में रस की वार्ता भी दुर्लभ थी।
मत्स्यकूर्मावतारेषु रस-वार्तापि दुर्लभा॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (8)
भगवान और भक्त दोनों को आनन्द प्रदान करने वाली आह्लादिनी होने के कारण, श्रीराधा ही सदा रस की वृद्धि करती हैं। मत्स्य एवं कच्छप आदि अवतारों के समय में रस की वार्ता भी दुर्लभ थी।

