आरति आनि सहचरिज साजी मनिमय - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (5)

आरति आनि सहचरिज साजी मनिमय - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (5)

आरति आनि सहचरिज साजी।
मनिमय थार, प्रेम की बाती, घृत कपूर रुचि राजी॥ [1]
जोति जगाय नेह चितबनि, मुसक्यान लाज लजि भाजी।
भगवत रसिक वारि तृन तोरत, झाँझ झालरी बाजी॥ [2]

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (5)

नित्य-विहार की सहचरियाँ अपने मन के भावों से प्रिया-प्रियतम की प्रेमपूर्वक आरती किस प्रकार उतारती हैं, उसका इस पद में भगवद् रसिक जी ने अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।

सहचरियों ने आकर प्रियालाल की अद्भुत आरती सजाई है, जिसमें मन रूपी थाल है, प्रेम रूपी बाती है और लाड़िली-लाल को रस-विलास कराने की अनन्त रुचियों का घी और कपूर सुशोभित हो रहे हैं। [1]

स्नेहपूर्ण चितवन की ज्योति जगाई गई है और मुस्कान की लाजाएँ (खीलें) बखेरी गई हैं, जिनके सामने धान की लाजाएँ भी लज्जित होकर भाग गई हैं। भगवतरसिक जी कहते हैं कि रसिक युगल की इस अद्भुत शोभा पर बलिहारी जाती हुई सहचरियाँ जो तृण तोड़ रही हैं, वही मानो झाँझ-झालरी बज रही हैं। [2]