पुरुष भाव धीरि लाल पै - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)

पुरुष भाव धीरि लाल पै - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)

पुरुष भाव धीरि लाल पै, त्रिया भाव करि प्रीय।
तत्सुख लाड़ विहार कौं, जुगल प्रेम धीर होय॥

- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)

लालजी (श्रीकृष्ण) में ही पुरुष भाव को रखकर तथा श्री प्रियाजी (श्री राधा) में 'त्रिया भाव' (सखी या सहचरी भाव) रखकर, श्री युगल को निष्काम प्रेम द्वारा, 'तत्सुख भाव' (केवल उनके सुख के लिए) धारण कर के उनके पारस्परिक नित्य विहार में उन्हें लाड़ लड़ाना ही उपासना की पराकाष्ठा है।