हरिजन रोइ रोइ सुख पावें।
विरह अग्नि तन भाटीमें दै,
चाह धातु सरसावैं॥ [1]
निस दिन जागें आनंद पागैं,
दंपति गुन गन गावैं।
रूपलाल हितचितकी करनी,
मन हरनी दरसावैं॥ [2]
- श्री हित रूप लाल
श्रीहरि के वास्तविक प्रेमी भक्त उनके लिए आँसू बहाकर, अर्थात् हरि के लिए रो-रोकर ही परम सुख (रस) प्राप्त करते हैं। वे अपने तन को विरह की अग्नि-रूपी भट्टी में तपाकर, अपने हृदय में प्रियतम से मिलन की चाह-रूपी धातु को और अधिक सरस एवं प्रेममय बनाते हैं। [1]
वे रात-दिन श्रीयुगल-दंपति (राधा-कृष्ण) के ध्यान में जागते हुए परमानंद में निमग्न रहते हैं और उनके दिव्य गुणों का गान करते रहते हैं। श्रीरूपलाल जी कहते हैं कि ऐसे प्रेमी भक्तों की हितमयी चेष्टाएँ इतनी मनोहर होती हैं कि वे मन को हर लेती हैं। [2]
विरह अग्नि तन भाटीमें दै,
चाह धातु सरसावैं॥ [1]
निस दिन जागें आनंद पागैं,
दंपति गुन गन गावैं।
रूपलाल हितचितकी करनी,
मन हरनी दरसावैं॥ [2]
- श्री हित रूप लाल
श्रीहरि के वास्तविक प्रेमी भक्त उनके लिए आँसू बहाकर, अर्थात् हरि के लिए रो-रोकर ही परम सुख (रस) प्राप्त करते हैं। वे अपने तन को विरह की अग्नि-रूपी भट्टी में तपाकर, अपने हृदय में प्रियतम से मिलन की चाह-रूपी धातु को और अधिक सरस एवं प्रेममय बनाते हैं। [1]
वे रात-दिन श्रीयुगल-दंपति (राधा-कृष्ण) के ध्यान में जागते हुए परमानंद में निमग्न रहते हैं और उनके दिव्य गुणों का गान करते रहते हैं। श्रीरूपलाल जी कहते हैं कि ऐसे प्रेमी भक्तों की हितमयी चेष्टाएँ इतनी मनोहर होती हैं कि वे मन को हर लेती हैं। [2]

