जगत भगत सबहीं हँसो, बुरौ न मानूं कोय।
श्रीराधावर सुमिरताँ, होनी होय सो होय॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (44)
चाहे संसारी लोग हों या भक्तजन, सभी मेरी हँसी उड़ाएँ, मेरा उपहास करें, मैं किसी की बात का रंचक मात्र भी बुरा नहीं मानूँगा। श्री राधारमण का निरंतर स्मरण करते हुए अब जो होना है, सो होता रहे, मुझे उसकी कोई परवाह नहीं।
श्रीराधावर सुमिरताँ, होनी होय सो होय॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (44)
चाहे संसारी लोग हों या भक्तजन, सभी मेरी हँसी उड़ाएँ, मेरा उपहास करें, मैं किसी की बात का रंचक मात्र भी बुरा नहीं मानूँगा। श्री राधारमण का निरंतर स्मरण करते हुए अब जो होना है, सो होता रहे, मुझे उसकी कोई परवाह नहीं।

