(कुण्डलियाँ)
करौ कृपा नव नागरी, अद्भुत करुना ऐंन।
लागै सरस सुहावनी, श्री वृंदावन धरि रैंन॥ [1]
श्री वृंदावन धरि रैंनु, करौं दिन रैनि वसेरो।
भरयौ प्रेम अनुराग, ना जानूँ साँझ सवेरो॥ [2]
कुंज-कुंज तें माँगि जूठ रसिकनि की पाऊँ।
सुनि-सुनि कथा केलि तुव सुंदरी, वेग विवस ह्वै जाऊँ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (18)
हे नव-नागरी (श्री राधिके)! आप अद्भुत करुणा की साक्षात् सागर हैं, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे श्री वृंदावन धाम की रेणु (रज) में परम श्रद्धा हो और यह रज अत्यंत सरस तथा सुहावनी लगने लगे। [1]
मैं श्री वृंदावन धाम की रेणु में परम श्रद्धा रखते हुए अखंड वास करूँ और प्रेम-अनुराग में ऐसा मग्न रहूँ कि मुझे दिन-रात की सुध ही न रहे। [2]
श्रीधाम वृंदावन के कुंजों में जाकर रसिक संतों की प्रसादी जूठन माँगकर पाऊँ और हे सुंदरी! आपकी अद्भुत केलि-कथाओं को सुन-सुनकर प्रेम के आवेग में विवश हो जाऊँ। [3]
करौ कृपा नव नागरी, अद्भुत करुना ऐंन।
लागै सरस सुहावनी, श्री वृंदावन धरि रैंन॥ [1]
श्री वृंदावन धरि रैंनु, करौं दिन रैनि वसेरो।
भरयौ प्रेम अनुराग, ना जानूँ साँझ सवेरो॥ [2]
कुंज-कुंज तें माँगि जूठ रसिकनि की पाऊँ।
सुनि-सुनि कथा केलि तुव सुंदरी, वेग विवस ह्वै जाऊँ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (18)
हे नव-नागरी (श्री राधिके)! आप अद्भुत करुणा की साक्षात् सागर हैं, मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे श्री वृंदावन धाम की रेणु (रज) में परम श्रद्धा हो और यह रज अत्यंत सरस तथा सुहावनी लगने लगे। [1]
मैं श्री वृंदावन धाम की रेणु में परम श्रद्धा रखते हुए अखंड वास करूँ और प्रेम-अनुराग में ऐसा मग्न रहूँ कि मुझे दिन-रात की सुध ही न रहे। [2]
श्रीधाम वृंदावन के कुंजों में जाकर रसिक संतों की प्रसादी जूठन माँगकर पाऊँ और हे सुंदरी! आपकी अद्भुत केलि-कथाओं को सुन-सुनकर प्रेम के आवेग में विवश हो जाऊँ। [3]

