मन तन दृग राधा गहे - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (13)

मन तन दृग राधा गहे - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (13)

मन तन दृग राधा गहे, रही न सुधि कछु और।
बकत कछू जो जिय चढ़त, हियें विरह की रौर॥

- श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (13)

मेरे मन, तन और नेत्रों को पूर्ण रूप से श्रीराधा ने अपने वशीभूत कर लिया है (अर्थात् वे पूरी तरह राधा-मय हो चुके हैं), अब अन्य किसी की कोई सुध-बुध नहीं रही है। हृदय में निरंतर विरह की व्याकुलता और हाहाकार मचा रहता है, जिसके कारण मन में जो कुछ भी उमड़ता है, वही मुख से अनायास निकल पड़ता है (अर्थात् विरह की अतिशयता में केवल प्रलाप ही शेष रह गया है)।