लीला हैं अनन्त नाम रूप - श्री चरणदास, भक्ति सागर

लीला हैं अनन्त नाम रूप - श्री चरणदास, भक्ति सागर

(कवित्त)
लीला हैं अनन्त नाम रूप हैं अनन्त जाके,
शक्ति हैं अनन्त वारपार हू न पायो है। [1]
महिमा अपार रहे देव मौन धार मुख,
जै जै उचार निज शीशहू नवायो है॥ [2]
ब्रह्मा से अनन्त सोऊ वेद को उचार करें,
नारद अनन्त जाको गुणाबाद गायो है। [3]
कहै चरणदास सोई नन्द को दुलारो प्यारो,
दे दे नवनीत ब्रजबालन नचायो है॥ [4]

- श्री चरणदास, भक्ति सागर

जिनकी लीलाएँ, नाम, रूप और शक्तियाँ अनंत हैं तथा जिनका कोई पार नहीं पा सका है। [1]

जिनकी अपार महिमा के सामने देवतागण मौन धारण कर केवल जय-जयकार करते हुए अपना सिर नवाते हैं। [2]

अनंत ब्रह्मा वेद-मंत्रों द्वारा जिनकी महिमा का गान करते हैं और अनंत नारद जिनके गुणों का कीर्तन करते हैं। [3]

संत चरणदास जी कहते हैं कि ऐसे सर्वसमर्थ भगवान श्री कृष्ण को ब्रज की बालाओं ने अपने प्रेम के वशीभूत कर थोड़े से माखन के लिए अपने इशारों पर नचाया है। [4]