सहज स्वाँस तीरथ बहै, सहजो जो कोइ न्हाय।
पाप पुन्न दोनों छुटै, हरि पद पहुँचे जाय॥
- श्री सहजो बाई
सहजोबाई जी कहती हैं कि श्रीहरि मनुष्य के भीतर ही विराजमान हैं और प्रत्येक सहज श्वास में उस परम तत्त्व की पावन धारा प्रवाहित हो रही है। जो साधक अंतर्मुख होकर इस सहज तीर्थ में स्नान करता है, अर्थात् अपने भीतर विराजमान श्रीहरि में निमग्न हो जाता है, उसके पाप-पुण्य दोनों समाप्त हो जाते हैं और वह श्रीहरि के परम पद को प्राप्त हो जाता है।
पाप पुन्न दोनों छुटै, हरि पद पहुँचे जाय॥
- श्री सहजो बाई
सहजोबाई जी कहती हैं कि श्रीहरि मनुष्य के भीतर ही विराजमान हैं और प्रत्येक सहज श्वास में उस परम तत्त्व की पावन धारा प्रवाहित हो रही है। जो साधक अंतर्मुख होकर इस सहज तीर्थ में स्नान करता है, अर्थात् अपने भीतर विराजमान श्रीहरि में निमग्न हो जाता है, उसके पाप-पुण्य दोनों समाप्त हो जाते हैं और वह श्रीहरि के परम पद को प्राप्त हो जाता है।

