श्रीराधामय वृन्दावन धाम - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

श्रीराधामय वृन्दावन धाम - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

श्रीराधामय वृन्दावन धाम।
राधा राधा होत जहाँ नित, हरपल आठों याम॥ [1]
श्याम सुन्दर वंशी में टेरत, मधुमय राधा नाम।
अनमोल रतन ये अक्षर इन पे, लुट जाते घनश्याम॥ [2]
वृन्दावन के पत्ते पत्ते, गाते रहते राधा नाम।
राधा नाम रटे रसिक हिय, बनत सदा सुख धाम॥ [3]
रटत जो राधा नाम निरन्त,र वो होवत निर्मल निष्काम।
रटो री रसना राधा राधा, नहि तेरो लागे कछु दाम॥ [4]
राधा नाम लिए बिना नहिं, बनत यहाँ पर कोई काम।
'राधाचरणदास' स्वामिनी, करि राखहु निज नित्य गुलाम॥ [5]

- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली

यह श्री वृंदावन धाम पूर्णतः श्री राधामय है, जहाँ आठों पहर केवल "राधा राधा" नाम की ही गूँज रहती है।[1]

स्वयं श्यामसुंदर अपनी वंशी की तान में इसी अत्यंत मधुर 'राधा' नाम को पुकारते हैं। 'रा' एवं 'धा' ये दो अक्षर ऐसे अनमोल रत्न हैं, जिन पर भगवान श्रीकृष्ण भी अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। [2]

वृन्दावन का एक-एक पत्ता सदा राधा नाम का ही गान करता रहता है। रसिक अपने हृदय में इस परम मंगलकारी राधा नाम को ही सदा रटते रहते हैं जिससे उनका अंतःकरण सदा परम सुख का धाम बना रहता है। [3]

जो जीव निरंतर राधा नाम का स्मरण करता है, वह सर्वथा निर्मल और निष्काम हो जाता है। इसलिए हे मेरी जिह्वा! तू सदैव राधा-राधा नाम रटती रह, क्योंकि इस नाम के जप में तेरा कोई मूल्य नहीं लगता। [4]

इस श्री धाम वृंदावन में श्री राधा नाम का आश्रय लिए बिना कोई भी साधन सिद्ध नहीं होता है।श्रीराधाचरणदास जी याचना करते हैं कि हे मेरी स्वामिनी श्रीराधा! आप मुझे अपने चरणों का सदा नित्य दास बनाये रखिए। [5]