अँग अँग माहीं जव लगै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (238.3)

अँग अँग माहीं जव लगै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (238.3)

अँग अँग माहीं जव लगै, श्रीवृन्दावन रैन।
नैनन ते असुवा ढरैं, तब जीवन सुख चैन॥

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (238.3)

जब श्रीधाम वृंदावन की परम-पावन रज मेरे अंग-अंग को स्पर्श करती है और नेत्रों से निष्काम प्रेम के अश्रु बहने लगते हैं, तभी इस जीवन में सच्चे सुख और परम शांति की अनुभूति होती है।