तुम तजि और कौन पै जाउँ - श्री सूरदास, सूरसागर (164)

तुम तजि और कौन पै जाउँ - श्री सूरदास, सूरसागर (164)

(राग मलार)
तुम तजि और कौन पै जाउँ?
काकैं द्वार जाइ सिर नाऊँ, पर हथ कहाँ बिकाउँ॥ [1]
ऐसौ को दाता हैं समरथ, जाके दिएँ अघाउँ।
अंत काल तुम्हरौं सुमिरन गति, अनत कहूँ नहिँ दाउँ॥ [2]
रंक सुदामा कियौ अजाची, दियौ अभय-पद ठाउँ।
कामधेनु, चिंतामनि, दीन्हौँ, कल्पवृच्छ-तर छाउँ॥ [3]
भव-समुद्र अति देखि भयानक, मन मैं अधिक डराउँ।
कीजै कृपा सुमिरि अपनौ प्रन, सूरदास बलि जाउँ॥ [4]

- श्री सूरदास, सूरसागर (164)

हे प्रभु श्रीकृष्ण! आपको छोड़कर मैं और किसके पास जाऊँ? किसके द्वार पर जाकर अपना सिर झुकाऊँ और स्वयं को किसी अन्य के हाथों क्यों सौंपूँ, अर्थात् आपके अतिरिक्त किसी और का आश्रय क्यों ग्रहण करूँ? [1]

आपके समान ऐसा कौन समर्थ दाता है, जिसके दिए से पूर्ण तृप्ति हो जाए? अन्त समय में भी आपका स्मरण ही मेरी परम गति और आश्रय है। आपके अतिरिक्त कहीं और मेरा कोई ठिकाना नहीं, न ही मैंने किसी अन्य पर कोई आशा रखी है। [2]

आपने निर्धन सुदामा को इतना समृद्ध कर दिया कि उन्हें फिर किसी से कुछ माँगने की आवश्यकता ही न रही और उन्हें निर्भय पद प्रदान किया। आपने अपने आश्रितों को मानो कामधेनु, चिंतामणि और कल्पवृक्ष की छाया प्रदान कर उनकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर दीं। [3]

इस अत्यन्त भयानक भव-सागर को देखकर मेरा मन बहुत भयभीत होता है। हे प्रभु! अपने भक्तों की रक्षा करने के अपने प्रण को स्मरण कर मुझ पर कृपा कीजिए। सूरदास जी कहते हैं, मैं आप पर बलिहारी जाता हूँ। [4]