आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है - श्री सुंदरदास जी

आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है - श्री सुंदरदास जी

(कवित्त)
आप ही के घट मैं प्रगट परमेश्वर है,
ताहि छोडि भूलै नर दूर दूर जात है। [1]
कोई दोरै द्वारिका कौ कोई काशी जगनाथ,
कोई दोरै मथुरा को हरिद्वार न्हात है॥ [2]
कोई दोरै बद्रीनाथ विषम पहाड चढि,
कोई तो केदार जात मन मैं सिहात है। [3]
सुन्दर कहत गुरुदेव देहि दिव्य नैन,
दूरि ही कै दूरवीन निकट दिखात है॥ [4]

- श्री सुंदरदास जी

मनुष्य के अपने ही हृदय के भीतर साक्षात् भगवान प्रकट रूप में विराजमान हैं, परंतु उस अंतर्यामी प्रभु को छोड़कर मनुष्य अज्ञानवश उन्हें खोजने के लिए व्यर्थ ही दूर-दूर भटकता रहता है। [1]

इस अज्ञान के कारण कोई दौड़कर द्वारिका जाता है, कोई काशी और जगन्नाथपुरी की यात्रा करता है, तो कोई मथुरा की ओर भागता है और कोई हरिद्वार जाकर गंगा में स्नान करता है। [2]

कोई अत्यंत कठिन और दुर्गम पर्वतों पर चढ़कर बद्रीनाथ धाम की ओर दौड़ता है, तो कोई केदारनाथ की यात्रा करके मन ही मन अत्यंत हर्षित और आनंदित होता है। [3]

सुंदरदास जी कहते हैं कि जब सद्गुरु कृपा करके जीव को ज्ञान रूपी दिव्य नेत्र प्रदान करते हैं, तब वह दिव्य दृष्टि रूपी दूरबीन दूर प्रतीत होने वाले परमात्मा को अत्यंत निकट ही हृदय में प्रत्यक्ष दिखा देती है। [4]