(कवित्त)
सुंदर-बदन राधे, सोभा को सदन तेरो,
बदन बनायो चार-बदन बनायकै। [1]
ताकी रुचि लैन को उदित भयौ रैन-पति,
मूढ़-मति राख्यो निज कर बगरायकै॥ [2]
'मतिराम' कहै, निसिचर चोर जानि याहि,
दीनी है सजाय कमलासन रिसायकै। [3]
रातौ-दिन फिरै अमरालय के आस-पास,
मुख मैं कलंक-मिस कारिख लगायकै॥ [4]
- श्री मतिराम
हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है। [1]
आपके मुख की शोभा और कान्ति को चुराने की इच्छा से रात्रि का स्वामी चन्द्रमा उदित हुआ, पर उस मूर्ख ने अपनी किरणों रूपी हाथों को फैलाकर मानो स्वयं ही अपने चोरी के प्रयत्न को प्रकट कर दिया। [2]
कवि मतिराम कहते हैं कि रात्रि में विचरण करने वाले इस चंद्रमा को चोर समझकर, कमल के आसन पर विराजमान होने वाले ब्रह्मा ने अत्यंत क्रोधित होकर इसे कठोर दंड दिया है। [3]
उसी दंड के कारण यह चंद्रमा रात-दिन देवलोक के आस-पास चक्कर काटता फिरता है और उसके मुख पर दिखाई देने वाला यह कलंक वास्तव में उस चोरी के अपराध में उसके मुख पर पोती गई कालिख ही है। [4]
सुंदर-बदन राधे, सोभा को सदन तेरो,
बदन बनायो चार-बदन बनायकै। [1]
ताकी रुचि लैन को उदित भयौ रैन-पति,
मूढ़-मति राख्यो निज कर बगरायकै॥ [2]
'मतिराम' कहै, निसिचर चोर जानि याहि,
दीनी है सजाय कमलासन रिसायकै। [3]
रातौ-दिन फिरै अमरालय के आस-पास,
मुख मैं कलंक-मिस कारिख लगायकै॥ [4]
- श्री मतिराम
हे सुंदर मुख वाली श्रीराधे! आपका मुख स्वयं सौंदर्य का धाम है। ऐसा प्रतीत होता है कि चार मुख वाले ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों की समस्त रचना-कुशलता लगाकर आपके इस अनुपम मुख की रचना की है। [1]
आपके मुख की शोभा और कान्ति को चुराने की इच्छा से रात्रि का स्वामी चन्द्रमा उदित हुआ, पर उस मूर्ख ने अपनी किरणों रूपी हाथों को फैलाकर मानो स्वयं ही अपने चोरी के प्रयत्न को प्रकट कर दिया। [2]
कवि मतिराम कहते हैं कि रात्रि में विचरण करने वाले इस चंद्रमा को चोर समझकर, कमल के आसन पर विराजमान होने वाले ब्रह्मा ने अत्यंत क्रोधित होकर इसे कठोर दंड दिया है। [3]
उसी दंड के कारण यह चंद्रमा रात-दिन देवलोक के आस-पास चक्कर काटता फिरता है और उसके मुख पर दिखाई देने वाला यह कलंक वास्तव में उस चोरी के अपराध में उसके मुख पर पोती गई कालिख ही है। [4]

