जुव कवनी वैस किसोर दोऊ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (110)

जुव कवनी वैस किसोर दोऊ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (110)

(राग नट)
जुव कवनी वैस किसोर दोऊ
निकसि ठाढे भए सघन बन तें।
तन तन में बसत मन मन में लसत
सोभा बाढी दुहुँ दिसि
मानौं प्रकट भई दामिनि घन घन तें॥ [1]
मोहन गहर गंभीर वदन पिक बानी
उपजत मानौं प्रिया के वचन तें।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
ऐसौ को जासौं मन लागै अनतें॥ [2]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (110)

सुन्दर युगल-किशोर, श्रीश्यामा-श्याम सघन निकुंज से निकलकर एक साथ खड़े हुए हैं। दोनों के तन एक-दूसरे के तन में समाए हुए हैं और दोनों के मन एक-दूसरे के मन में सुशोभित हो रहे हैं। दोनों ओर से उनकी छवि ऐसी बढ़ रही है, मानो दामिनी और नव मेघ सुशोभित हैं। [1]

मनमोहन की वाणी गंभीर गम्भीर है, परंतु वे कोयल के मधुर स्वर में बात कर रहे हैं मानो श्री प्रिया जी के वचन के समरूप बोल रहे हैं। स्वामी श्रीहरिदासजी कहते हैं, “मेरे स्वामी श्रीश्यामा-कुंजबिहारी हैं जो परस्पर नित्य विहार कर रहे हैं। भला ऐसा कौन होगा, जिसका मन उन्हें छोड़कर किसी अन्य में लग सके?” [2]