आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (55)

आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (55)

(राग मलार)
आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं।
बिच लै स्याम घटा अति नौंतन, ताके रंग रसीं॥ [1]
एक चमकि चहुँ ओर सखी री, अपने सुभाइ लसी।
आई एक सरस गहनी में, दुहुँ भुज बीच बसी॥ [2]
अंबुज नील उभै विधु राजत, तिनकी चलन खसी।
(जै श्री) हित हरिवंश लोभ भेटन मन, पूरन सरद ससी॥ [3]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (55)

हे सखी! आज दो दामिनियों में परस्पर होड़ लगी है। दोनों अत्यंत नवीन श्याम घटाओं के बीच रहकर उनके श्यामल रंग में रंगी हैं। एक दामिनी (बिजली) आकाश की श्याम घटाओं के बीच चमक रही है और दूसरी श्रीराधा हैं, जो श्याम मेघ के समान वर्ण वाले श्रीकृष्ण के संग शोभायमान हो रही हैं। [1]

हे सखी! एक दामिनी अपने स्वाभाविक सौंदर्य से चारों ओर चमककर शोभायमान हो रही है, और दूसरी दामिनी अर्थात् श्रीराधा अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के सरस आलिंगन में आकर उनकी दोनों भुजाओं के बीच विराजमान हैं। [2]

श्रीकृष्ण की दोनों भुजाएँ नीलकमलों के समान हैं, जिनके बीच श्रीराधाजी का चन्द्रमा के समान सुंदर मुख सुशोभित हो रहा है। उस मुखचन्द्र की अनुपम कान्ति के सामने नीलकमल रूपी भुजाओं की चेष्टा मानो शिथिल पड़ गई है। सखी भावपन्न श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि श्रीकृष्ण का मन शरद् पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान उज्ज्वल श्रीराधा के मुखचन्द्र का चुम्बन करने के लिए अत्यंत लालायित है। [3]