वृन्दाविपिन विलास कौ ब्रह्म न पायौ अंत - श्री ब्रजजीवन जी

वृन्दाविपिन विलास कौ ब्रह्म न पायौ अंत - श्री ब्रजजीवन जी

वृन्दाविपिन विलास कौ, ब्रह्म न पायौ अंत।
सदा सुमन फल एक रस, 'ब्रजजीवन' हुलसंत॥

- श्री ब्रजजीवन जी

श्री वृन्दावन के नित्य विलास का अंत स्वयं परब्रह्म भी नहीं पा सकते, जहाँ के पुष्प और फल दिव्य प्रेम-रस से परिपूर्ण होकर सदा आनंद में झूमते रहते हैं, जिसे देखकर श्री ब्रजजीवन का हृदय सदैव प्रफुल्लित रहता है।