(कवित्त)
राधिका कौ नाम सुखधाम विसराम चहे, येरे मन मेरे बाबरेन कौं न रट रे। [1]
संतन के संग रंग अंग-अंग छै उमंग, होय गत पंग भंग जंग जग हट रे॥ [2]
वृन्दावन वास आस विमल विकास रास, मिथुन सों हास खास दास होहु चट रे। [3]
कालिन्दी के कूल मूल नेह रस झूल फूल, 'प्रेमसखी' नाह तूल दम्पति सां सट रे॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (20)
हे मेरे बावले मन! यदि तू परम सुख और विश्राम की प्राप्ति चाहता है, तो व्यर्थ के सांसारिक विषयों और प्रपंचों को त्यागकर श्रीराधिका के नाम का ही निरंतर स्मरण क्यों नहीं करता? [1]
संतों की संगति में आनंदमग्न होकर भगवद्प्रेम के रंग में ऐसा रँग जा कि तेरे अंग-अंग में दिव्य उमंग भर उठे और संसार के समस्त द्वंद्व, बंधन तथा जन्म-मरण के कष्ट मिट जाएँ। [2]
तेरे हृदय में श्रीवृंदावन में वास करने की अभिलाषा जागृत हो और श्री युगल सरकार के निर्मल रास-विलास का प्रेममय भाव विकसित हो। उनका प्रिय दास बनकर उनके नित्य हास्य-विनोद और प्रेममयी लीलाओं के रस का आनंद प्राप्त कर। [3]
श्रीयमुना जी के पावन तट पर प्रेम-रस में निमग्न होकर सदा आनंदित और प्रफुल्लित रह। प्रेमसखी जी कहती हैं कि इस दिव्य युगल की समता करने वाला कोई दूसरा नहीं है। अतः तू सदा इन्हीं के अनन्य प्रेम और आश्रय में लीन रह। [4]
राधिका कौ नाम सुखधाम विसराम चहे, येरे मन मेरे बाबरेन कौं न रट रे। [1]
संतन के संग रंग अंग-अंग छै उमंग, होय गत पंग भंग जंग जग हट रे॥ [2]
वृन्दावन वास आस विमल विकास रास, मिथुन सों हास खास दास होहु चट रे। [3]
कालिन्दी के कूल मूल नेह रस झूल फूल, 'प्रेमसखी' नाह तूल दम्पति सां सट रे॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (20)
हे मेरे बावले मन! यदि तू परम सुख और विश्राम की प्राप्ति चाहता है, तो व्यर्थ के सांसारिक विषयों और प्रपंचों को त्यागकर श्रीराधिका के नाम का ही निरंतर स्मरण क्यों नहीं करता? [1]
संतों की संगति में आनंदमग्न होकर भगवद्प्रेम के रंग में ऐसा रँग जा कि तेरे अंग-अंग में दिव्य उमंग भर उठे और संसार के समस्त द्वंद्व, बंधन तथा जन्म-मरण के कष्ट मिट जाएँ। [2]
तेरे हृदय में श्रीवृंदावन में वास करने की अभिलाषा जागृत हो और श्री युगल सरकार के निर्मल रास-विलास का प्रेममय भाव विकसित हो। उनका प्रिय दास बनकर उनके नित्य हास्य-विनोद और प्रेममयी लीलाओं के रस का आनंद प्राप्त कर। [3]
श्रीयमुना जी के पावन तट पर प्रेम-रस में निमग्न होकर सदा आनंदित और प्रफुल्लित रह। प्रेमसखी जी कहती हैं कि इस दिव्य युगल की समता करने वाला कोई दूसरा नहीं है। अतः तू सदा इन्हीं के अनन्य प्रेम और आश्रय में लीन रह। [4]

