श्रीललिता-पद भजन दुहेलो।
बिना कृपा श्रीराधा रानी की, क्यों परसे या रसहिँ अमेलो॥ [1]
नहिं कोऊ साधन चरना फल, इक पौंहचे या नेह नबेलो।
जय श्री बंशी लोक वेद बिसराबे, भजनी ता बल नित अलबेलो॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (33)
श्री ललिता जी के चरणों की कृपा से प्राप्त होने वाले श्री राधा-कृष्ण के नित्य-विहार रस का भजन अत्यंत दुर्लभ और कठिन है। श्री राधारानी की अकारण करुणा के बिना इस अनुपम और निर्मल प्रेमरस का स्पर्श भला कोई कैसे कर सकता है? [1]
इस नित्य-नवीन प्रेम की लता तक पहुँचने के लिए श्री ललिता जी के चरणों की कृपा के अतिरिक्त कोई अन्य साधन फलदायी नहीं है। श्री वंशी अलि कहते हैं कि श्री राधा-कृष्ण के नित्य-विहार की इस अनन्य प्रेममयी उपासना में लोक और वेद की मर्यादाओं का भी विस्मरण हो जाता है। इसी भक्ति के बल पर साधक नित्य प्रेमरस में निमग्न होकर नित्य अलबेला एवं कृतार्थ रहता है (अथवा अलबेले श्री कृष्ण के हृदय का हार भी यही रस है)। [2]
बिना कृपा श्रीराधा रानी की, क्यों परसे या रसहिँ अमेलो॥ [1]
नहिं कोऊ साधन चरना फल, इक पौंहचे या नेह नबेलो।
जय श्री बंशी लोक वेद बिसराबे, भजनी ता बल नित अलबेलो॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (33)
श्री ललिता जी के चरणों की कृपा से प्राप्त होने वाले श्री राधा-कृष्ण के नित्य-विहार रस का भजन अत्यंत दुर्लभ और कठिन है। श्री राधारानी की अकारण करुणा के बिना इस अनुपम और निर्मल प्रेमरस का स्पर्श भला कोई कैसे कर सकता है? [1]
इस नित्य-नवीन प्रेम की लता तक पहुँचने के लिए श्री ललिता जी के चरणों की कृपा के अतिरिक्त कोई अन्य साधन फलदायी नहीं है। श्री वंशी अलि कहते हैं कि श्री राधा-कृष्ण के नित्य-विहार की इस अनन्य प्रेममयी उपासना में लोक और वेद की मर्यादाओं का भी विस्मरण हो जाता है। इसी भक्ति के बल पर साधक नित्य प्रेमरस में निमग्न होकर नित्य अलबेला एवं कृतार्थ रहता है (अथवा अलबेले श्री कृष्ण के हृदय का हार भी यही रस है)। [2]

