जय जय राधे वृषभान सुता - श्री सरस माधुरी

जय जय राधे वृषभान सुता - श्री सरस माधुरी

(राग ठुमरी व सोरठ)
जय जय राधे वृषभान सुता, जय कीरति राज दुलारी की।
जय शीश चन्द्रका धारी की, जय नील वसन तन वारी की॥ [1]
जय नख शिख भुषन अंग धरन, जय गौर बरन सुख कारी की।
जय ललित विसाखा की जीवन, जय मोहन प्राण अधारी की॥ [2]
जय कुंज विलासनि सुख रासनि, जय सुंदर रूप उजारी की।
जय जय गज गामिनि श्यामा स्वामिनि, सरसमाधुरी प्यारीकी॥ [3]

- श्री सरस माधुरी

वृषभानु जी की लाडली श्री राधा की जय हो, कीर्ति जी की दुलारी की जय हो। अपने मस्तक पर सुंदर चंद्रिका धारण करने वाली और अपने श्रीअंगों पर नील वस्त्र धारण करने वाली श्रीजी की जय हो। [1]

नख से शिख तक समस्त अंगों में सुंदर आभूषण धारण करने वाली और परम सुखदायी, गौर वर्ण वाली श्रीजी की जय हो। श्री ललिता और विशाखा सखी की जीवन-प्राण तथा श्री कृष्ण के प्राणों की आधार, श्री राधा की जय हो। [2]

निकुंजों में क्रीड़ा-विलास करने वाली, सुख की राशि और अत्यंत सुंदर प्रकाशमान रूप वाली की जय हो। गजराज के समान सुंदर मंद चाल चलने वाली, सरस माधुरी की स्वामिनी श्री श्यामा प्यारी की जय हो। [3]