चांपनको करकंज पगन के - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (229)

चांपनको करकंज पगन के - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (229)

(राग देस उतरी)
चांपनको करकंज पगन के,
कोमल अंग धरेई रहैं। [1]
कान कथारसपान करन को,
अति आतुर लवरेई रहैं॥ [2]
‘ललितकिशोरी’ जुगुल छवीले,
हियरे मांहिं अरेई रहैं। [3]
लाड़िलीलाल के नेह सदा दोउ,
भाजन नैन भरेई रहैं॥ [4]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (229)

मेरे हाथ श्रीयुगल सरकार के चरणकमलों और कोमल अंगों की सेवा-चांपन करने के लिए सदा वहीं टिके रहें। [1]

मेरे कान उनकी लीलाकथा के रस का पान करने के लिए अत्यंत आतुर और सदा लालायित बने रहें। [2]

श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि वे परम सुंदर छबीले युगल सरकार मेरे हृदय में निरंतर अडिग होकर बसे रहें। [3]

और मेरे दोनों नेत्र सदा लाड़िली-लाल के अनन्य प्रेम से ही लबालब भरे रहें। [4]