वृन्दावन ही बीज है, वृन्दावन ही फुल।
वृन्दावन ही कल्पतरु, वृन्दावत रसमूल॥
- श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (86)
श्रीवृन्दावन ही विशुद्ध प्रेमाभक्ति का बीज है और श्रीवृन्दावन ही उसका खिला हुआ पुष्प है। श्रीवृन्दावन ही समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष है तथा श्रीवृन्दावन ही प्रेम-रस का मूल स्रोत और आधार है।
वृन्दावन ही कल्पतरु, वृन्दावत रसमूल॥
- श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (86)
श्रीवृन्दावन ही विशुद्ध प्रेमाभक्ति का बीज है और श्रीवृन्दावन ही उसका खिला हुआ पुष्प है। श्रीवृन्दावन ही समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष है तथा श्रीवृन्दावन ही प्रेम-रस का मूल स्रोत और आधार है।

