(राग सारंग)
मेरे नंद कौ लाल जिय बस्यौ।
तब तें सब सुख भयौ सखी री, नेंकु चितै जब मुरि मुस्यौ॥ [1]
नागरता की रासि साँवरौ, इहि स्वरूप मन माँहि कस्यौ।
'परमानंद' स्वामी सुख सागर, जाके रस सब ब्रज रस्यौ॥ [2]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (429)
हे सखी! नन्दबाबा के लाड़ले श्रीकृष्ण मेरे हृदय में बस गए हैं। जब से उन्होंने मेरी ओर तनिक चितवन करके मुड़कर मधुर मुस्कान बिखेरी है, तब से मेरा सम्पूर्ण जीवन सुख और आनन्द से भर गया है। [1]
वे साँवरे श्रीकृष्ण समस्त प्रेम-चातुरी और रसिकता के भण्डार हैं। उनका यही मनोहर स्वरूप मेरे मन में गहराई से बस गया है। श्रीपरमानन्ददास जी कहते हैं कि मेरे स्वामी श्रीकृष्ण सुख के अथाह सागर हैं, जिनके दिव्य प्रेम-रस में सम्पूर्ण ब्रज आनन्दमग्न रहता है। [2]
मेरे नंद कौ लाल जिय बस्यौ।
तब तें सब सुख भयौ सखी री, नेंकु चितै जब मुरि मुस्यौ॥ [1]
नागरता की रासि साँवरौ, इहि स्वरूप मन माँहि कस्यौ।
'परमानंद' स्वामी सुख सागर, जाके रस सब ब्रज रस्यौ॥ [2]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (429)
हे सखी! नन्दबाबा के लाड़ले श्रीकृष्ण मेरे हृदय में बस गए हैं। जब से उन्होंने मेरी ओर तनिक चितवन करके मुड़कर मधुर मुस्कान बिखेरी है, तब से मेरा सम्पूर्ण जीवन सुख और आनन्द से भर गया है। [1]
वे साँवरे श्रीकृष्ण समस्त प्रेम-चातुरी और रसिकता के भण्डार हैं। उनका यही मनोहर स्वरूप मेरे मन में गहराई से बस गया है। श्रीपरमानन्ददास जी कहते हैं कि मेरे स्वामी श्रीकृष्ण सुख के अथाह सागर हैं, जिनके दिव्य प्रेम-रस में सम्पूर्ण ब्रज आनन्दमग्न रहता है। [2]

