चाँपत पायँ मुदित मन सखियाँ - श्री मधुर प्रिया जी

चाँपत पायँ मुदित मन सखियाँ - श्री मधुर प्रिया जी

चाँपत पायँ मुदित मन सखियाँ।
धीरे-धीरे चरन पलोटत,
करत परस्पर युगल रस बतियाँ॥ [1]
शीतल मन्द पावन लागत हिय,
ढौरत शीतल विजन लगि अंखियाँ।
मंद मुसकान पुत सोवत छवि लखि,
‘मधुर प्रिया’ जुडवत हैं छतियाँ॥ [2]

- श्री मधुर प्रिया जी

सखियाँ अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर श्री युगल सरकार के चरणों की सेवा कर रही हैं। वे बड़ी कोमलता से धीरे-धीरे उनके चरणों को दबा रही हैं और श्री युगल की रसमयी बातों का आनंद ले रही हैं। [1]

शीतल, मंद और पवित्र वायु हृदय को अत्यंत सुखद लग रही है। सखियाँ शीतल पंखे से धीरे-धीरे हवा कर रही हैं और उनकी आँखें प्रिया-प्रियतम की मनोहर छवि पर लगी हुई हैं। श्री मधुर प्रिया जी कहती हैं कि युगल को शयन कराते हुए, उनके मुखमंडल की मंद मुस्कान से युक्त आलिंगनबद्ध मनमोहक छवि को देखकर सखियों का हृदय पूर्णतः तृप्त और रस में मगन हो रहा है। [2]