(कवित्त)
कोई कहौ कुलटा कुलीन अकुलीन कहौ,
कोऊ कहौ रंकिनी कलंकिनी कुनारी हौं। [1]
कैसो नर लोक परलोक बरलोकनि में,
लोन्हीं मैं अलोक लोक लोकनि ते न्यारी हौं॥ [2]
तन जाउ मन जाउ 'देव' गुरुजन जाउ,
प्रान किन जाउ टेक टरति न टारी हौं। [3]
वृन्दावन वारी बनवारी की मुकुटवारी,
पीत पट वारी वहि सूरति पै वारी हौं॥ [4]
- श्री देव जी
चाहे कोई मुझे दुराचारिणी कहे, कुलीन अथवा अकुलीन कहे, दरिद्र, कलंकिनी या कुल की मर्यादा का उल्लंघन करने वाली स्त्री कहे, मुझे इन बातों की तनिक भी परवाह नहीं है। [1]
इस लोक, परलोक अथवा अन्य श्रेष्ठ लोकों से मुझे क्या प्रयोजन? मैंने तो इन समस्त लोकों से विलक्षण उस अलौकिक प्रेम का मार्ग अपना लिया है, जो संसार की समस्त मर्यादाओं से सर्वथा भिन्न है। [2]
कवि देव जी कहते हैं कि चाहे मेरा शरीर छूट जाए, मन चला जाए, गुरुजन और संबंधी भी साथ छोड़ दें, यहाँ तक कि प्राण भी निकल जाएँ, किंतु मेरी यह दृढ़ प्रतिज्ञा अब किसी भी प्रकार टलने वाली नहीं है। [3]
मैं तो श्रीवृंदावन के बाँके बिहारी, मुकुट और पीताम्बर धारण करने वाले श्रीकृष्ण की मनमोहक छवि पर अपना सर्वस्व न्योछावर करती हूँ। [4]
कोई कहौ कुलटा कुलीन अकुलीन कहौ,
कोऊ कहौ रंकिनी कलंकिनी कुनारी हौं। [1]
कैसो नर लोक परलोक बरलोकनि में,
लोन्हीं मैं अलोक लोक लोकनि ते न्यारी हौं॥ [2]
तन जाउ मन जाउ 'देव' गुरुजन जाउ,
प्रान किन जाउ टेक टरति न टारी हौं। [3]
वृन्दावन वारी बनवारी की मुकुटवारी,
पीत पट वारी वहि सूरति पै वारी हौं॥ [4]
- श्री देव जी
चाहे कोई मुझे दुराचारिणी कहे, कुलीन अथवा अकुलीन कहे, दरिद्र, कलंकिनी या कुल की मर्यादा का उल्लंघन करने वाली स्त्री कहे, मुझे इन बातों की तनिक भी परवाह नहीं है। [1]
इस लोक, परलोक अथवा अन्य श्रेष्ठ लोकों से मुझे क्या प्रयोजन? मैंने तो इन समस्त लोकों से विलक्षण उस अलौकिक प्रेम का मार्ग अपना लिया है, जो संसार की समस्त मर्यादाओं से सर्वथा भिन्न है। [2]
कवि देव जी कहते हैं कि चाहे मेरा शरीर छूट जाए, मन चला जाए, गुरुजन और संबंधी भी साथ छोड़ दें, यहाँ तक कि प्राण भी निकल जाएँ, किंतु मेरी यह दृढ़ प्रतिज्ञा अब किसी भी प्रकार टलने वाली नहीं है। [3]
मैं तो श्रीवृंदावन के बाँके बिहारी, मुकुट और पीताम्बर धारण करने वाले श्रीकृष्ण की मनमोहक छवि पर अपना सर्वस्व न्योछावर करती हूँ। [4]

