प्रभु जू हौं तेरा तू मेरा।
राजी खसम कहा करै काजी, लोग बकौ बहुतेरा॥ [1]
हौं तू एक अनेक गनें गुन, दोस न किसहू केरा।
जल तरंग लौं सहज समागम, निर्मल सांझ सबेरा॥ [2]
कोउ स्वामी कोउ साहिब सेवक, कोउ चाकर कोउ चेरा।
बिना ममत्व इकत्व न ऐसा, जगतै भक्त घनेरा॥ [3]
तन मन प्राँन प्राँन सों-सनमुख, अब न फिरै मन फेरा।
श्रीबिहारीदास हरिदास नाँम निज, प्रेम निबेरा झेरा॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (35)
हे प्रभु! मैं आपका हूँ और आप मेरे हैं। जब आप (प्राणों के प्रियतम) स्वयं मुझ पर प्रसन्न हैं, तब क़ाज़ी के समान निर्णय सुनाने वाले वेद-शास्त्र मेरा क्या बिगाड़ सकते हैं? संसार के लोग चाहे कितनी ही बातें क्यों न बनाते रहें, वे मेरा क्या बिगड़ सकते हैं? [1]
जब आप और मैं एक हो गए हैं, तब अनेक गुण-अवगुण होने पर भी किसी में कोई दोष दिखाई नहीं देता। जिस प्रकार जल और उसकी तरंग एक-दूसरे से अभिन्न हैं, उसी प्रकार आपका और मेरा सहज एवं निर्मल मिलन दिन-रात निरंतर एकरस बना रहता है। [2]
इस संसार में अनेक भक्त हैं। कोई भगवान को अपना स्वामी मानता है, कोई साहिब, तो कोई स्वयं को उनका सेवक, चाकर अथवा दास समझता है। किंतु अनन्य ममत्व (सहज अपनेपन) के बिना प्रभु से अभिन्न एकत्व किसी को प्राप्त नहीं होता। [3]
अब मेरा तन, मन और प्राण श्रीप्रियाप्रियतम के प्राणों की अभिलाषा के अनुकूल उन्हीं के सम्मुख समर्पित हैं और मेरा मन किसी भी प्रकार उनसे विमुख नहीं हो सकता। श्रीबिहारिन देव जी कहते हैं कि श्रीस्वामी हरिदास जी की कृपा ने मुझे इस लोक और परलोक के समस्त बंधनों से मुक्त कर अपना ऐसा बना लिया है, मानो मैं किसी ऐसी गहरी खाई में गिर पड़ा हूँ, जहाँ से न तो स्वयं निकल सकता हूँ और न ही कोई दूसरा मुझे निकाल सकता है। [4]
राजी खसम कहा करै काजी, लोग बकौ बहुतेरा॥ [1]
हौं तू एक अनेक गनें गुन, दोस न किसहू केरा।
जल तरंग लौं सहज समागम, निर्मल सांझ सबेरा॥ [2]
कोउ स्वामी कोउ साहिब सेवक, कोउ चाकर कोउ चेरा।
बिना ममत्व इकत्व न ऐसा, जगतै भक्त घनेरा॥ [3]
तन मन प्राँन प्राँन सों-सनमुख, अब न फिरै मन फेरा।
श्रीबिहारीदास हरिदास नाँम निज, प्रेम निबेरा झेरा॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (35)
हे प्रभु! मैं आपका हूँ और आप मेरे हैं। जब आप (प्राणों के प्रियतम) स्वयं मुझ पर प्रसन्न हैं, तब क़ाज़ी के समान निर्णय सुनाने वाले वेद-शास्त्र मेरा क्या बिगाड़ सकते हैं? संसार के लोग चाहे कितनी ही बातें क्यों न बनाते रहें, वे मेरा क्या बिगड़ सकते हैं? [1]
जब आप और मैं एक हो गए हैं, तब अनेक गुण-अवगुण होने पर भी किसी में कोई दोष दिखाई नहीं देता। जिस प्रकार जल और उसकी तरंग एक-दूसरे से अभिन्न हैं, उसी प्रकार आपका और मेरा सहज एवं निर्मल मिलन दिन-रात निरंतर एकरस बना रहता है। [2]
इस संसार में अनेक भक्त हैं। कोई भगवान को अपना स्वामी मानता है, कोई साहिब, तो कोई स्वयं को उनका सेवक, चाकर अथवा दास समझता है। किंतु अनन्य ममत्व (सहज अपनेपन) के बिना प्रभु से अभिन्न एकत्व किसी को प्राप्त नहीं होता। [3]
अब मेरा तन, मन और प्राण श्रीप्रियाप्रियतम के प्राणों की अभिलाषा के अनुकूल उन्हीं के सम्मुख समर्पित हैं और मेरा मन किसी भी प्रकार उनसे विमुख नहीं हो सकता। श्रीबिहारिन देव जी कहते हैं कि श्रीस्वामी हरिदास जी की कृपा ने मुझे इस लोक और परलोक के समस्त बंधनों से मुक्त कर अपना ऐसा बना लिया है, मानो मैं किसी ऐसी गहरी खाई में गिर पड़ा हूँ, जहाँ से न तो स्वयं निकल सकता हूँ और न ही कोई दूसरा मुझे निकाल सकता है। [4]

