(राग नट)
लाल कैं यह मन ललक रहै।
कबहुँ प्रिया प्रसन्न बदन ह्वै, मो तन नैंकु चहै॥ [1]
अरु युग चरन चारु जावक के, चित्र सुरंग बनाऊँ।
पुनि अनुराग कमल मुख तें जब, बीरी खंडित पाऊँ॥ [2]
अपनें ही कर ते नख-सिख लौं, भूषन वसन बनाऊँ।
'हित ध्रुव' अहनिश यहै बिचारत, कैसैहुँ प्रियाहि रिझाऊँ॥ [3]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (27)
श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) के हृदय में सदैव यही लालसा बनी रहती है कि कब श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) प्रसन्न होकर मेरी ओर तनिक-सा निहारेंगी। [1]
कब मुझे वह सौभाग्य प्राप्त होगा कि मैं अपने हाथों से श्रीप्रियाजी के दोनों सुंदर चरणों में लाल महावर से चित्र बनाऊँ और इससे प्रसन्न होकर वे अपने मुख से चबाई हुई तांबूल-बीरी मुझे प्रसादस्वरूप प्रदान करें, जिसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँ। [2]
कब मैं अपने हाथों से श्रीप्रियाजी को नख से शिख तक सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित करूँगा? श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि श्रीलालजी रात-दिन, हर क्षण इसी विचार में मग्न रहते हैं कि किस प्रकार श्रीप्रियाजी को रिझाकर प्रसन्न कर सकें। [3]
लाल कैं यह मन ललक रहै।
कबहुँ प्रिया प्रसन्न बदन ह्वै, मो तन नैंकु चहै॥ [1]
अरु युग चरन चारु जावक के, चित्र सुरंग बनाऊँ।
पुनि अनुराग कमल मुख तें जब, बीरी खंडित पाऊँ॥ [2]
अपनें ही कर ते नख-सिख लौं, भूषन वसन बनाऊँ।
'हित ध्रुव' अहनिश यहै बिचारत, कैसैहुँ प्रियाहि रिझाऊँ॥ [3]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (27)
श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) के हृदय में सदैव यही लालसा बनी रहती है कि कब श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) प्रसन्न होकर मेरी ओर तनिक-सा निहारेंगी। [1]
कब मुझे वह सौभाग्य प्राप्त होगा कि मैं अपने हाथों से श्रीप्रियाजी के दोनों सुंदर चरणों में लाल महावर से चित्र बनाऊँ और इससे प्रसन्न होकर वे अपने मुख से चबाई हुई तांबूल-बीरी मुझे प्रसादस्वरूप प्रदान करें, जिसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँ। [2]
कब मैं अपने हाथों से श्रीप्रियाजी को नख से शिख तक सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित करूँगा? श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि श्रीलालजी रात-दिन, हर क्षण इसी विचार में मग्न रहते हैं कि किस प्रकार श्रीप्रियाजी को रिझाकर प्रसन्न कर सकें। [3]

