चकित नैन लखि बैन भये - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (70)

चकित नैन लखि बैन भये - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (70)

(दोहा)
चकित नैन लखि बैन भये, व्याकुल अति ही स्याम।
हँसी सखी की ओट ह्वै, स्यामा सब सुख धाम॥


(पद) [राग-कान्हरौ, तिताल]
स्यामा मदन मोहन की हरि लई बंसी।
चकित नैन बैन व्याकुल लखि, सखी ओट दै हंसी॥ [1]
इक सखी नैन सैन समुझाये, प्यारी परम प्रसंसी।
श्रीभट मुकुट लटक चरननि तट, करत हैं रसिक व तंसी॥ [2]

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (70)

रास के अवसर पर श्रीप्रियाजी के अद्भुत रूप-लावण्य के दर्शन कर श्रीलालजी माधुर्य-रस के सागर में डूब जाते हैं। उनका तन-मन आनंद की हिलोरें लेने लगता है। मदनमोहन श्रीश्यामसुंदर प्रेम में मतवाले होकर श्रीराधानाम का उच्चारण करने लगते हैं। उनकी इसी प्रेम-विह्वल अवस्था में श्रीप्रियाजी उनकी दृष्टि बचाकर उनकी वंशी चुरा लेती हैं।

(दोहा)
अपनी वंशी को न पाकर श्रीश्यामसुंदर चकित नेत्रों से इधर-उधर देखने लगते हैं और अत्यंत व्याकुल होकर दीन वचन कहने लगते हैं। उनकी ऐसी दशा देखकर समस्त सुखों की धाम श्रीश्यामाजी (श्रीराधा) एक सखी की ओट में छिपकर मंद-मंद मुस्कुराने लगती हैं।

(पद)
रास के समय अनेक प्रकार से रस उत्पन्न कर श्रीश्यामाजी मदनमोहन श्रीश्यामसुंदर की मुरली चुरा लेती हैं। अपनी प्रिय वंशी को न पाकर श्रीश्यामसुंदर चकित नेत्रों से इधर-उधर देखने लगते हैं। उनकी व्याकुलता से भरे दीन वचनों को सुनकर श्रीप्रियाजी एक सखी की ओट में छिपकर मंद-मंद मुस्कुराने लगती हैं। [1]

श्रीश्यामसुंदर की ऐसी दीन दशा देखकर एक सखी नेत्रों के संकेत से उन्हें भलीभाँति समझा देती है कि उनकी वंशी किस प्रकार वापस मिल सकती है। श्रीभट्ट जी कहते हैं कि सखी का संकेत समझकर रसिकशिरोमणि श्रीलालजी अपना मुकुट श्रीप्रियाजी के चरणारविंदों में झुकाकर अत्यंत उत्कंठा से दीन वचन कहने लगते हैं और मुरली के बहाने रसपूर्ण वचनों द्वारा श्रीप्रियाजी की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगते हैं। [2]