(राग झंझौटी)
जापै चढ़े युगल को रंग॥
भूल जाय त्रिभुवन सुख पल में, निरखत दम्पति अंग॥ [1]
तोरि कानि कुल फारे घूंघट, नैन नीर सुर भंग।
ललित लड़ैती नाचै गावै, मतवारन से ढंग॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, युगल-अनुराग (36)
जिस जीव पर श्रीराधा-कृष्ण के युगल प्रेम का रंग चढ़ जाता है, वह दंपति के श्रीअंगों की शोभा निरखते ही एक पल में तीनों लोकों के समस्त सुखों को भूल जाता है। [1]
वह कुल की मर्यादा और लोक-लज्जा को तोड़कर लज्जा रूपी घूंघट को फाड़ डालता है। उसके नेत्रों से निरंतर प्रेमाश्रु बहते हैं और कंठ गद्गद होने से स्वर टूट जाता है। श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं कि ऐसा प्रेमी मतवालों की भांति बेसुध होकर नाचने-गाने लगता है। [2]
जापै चढ़े युगल को रंग॥
भूल जाय त्रिभुवन सुख पल में, निरखत दम्पति अंग॥ [1]
तोरि कानि कुल फारे घूंघट, नैन नीर सुर भंग।
ललित लड़ैती नाचै गावै, मतवारन से ढंग॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, युगल-अनुराग (36)
जिस जीव पर श्रीराधा-कृष्ण के युगल प्रेम का रंग चढ़ जाता है, वह दंपति के श्रीअंगों की शोभा निरखते ही एक पल में तीनों लोकों के समस्त सुखों को भूल जाता है। [1]
वह कुल की मर्यादा और लोक-लज्जा को तोड़कर लज्जा रूपी घूंघट को फाड़ डालता है। उसके नेत्रों से निरंतर प्रेमाश्रु बहते हैं और कंठ गद्गद होने से स्वर टूट जाता है। श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं कि ऐसा प्रेमी मतवालों की भांति बेसुध होकर नाचने-गाने लगता है। [2]

