कुंज में बैठे स्यामा स्याम - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (665)

कुंज में बैठे स्यामा स्याम - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (665)

(राग सारंग)
कुंज में बैठे स्यामा स्याम।
आसपास मालती माधवी, विविध कुसुम बन्यौ धाम॥ [1]
सखी सहचरी ललिता विसाखा, करति मधुर स्वर गान।
अति आनंद मुदित मुख निरखति, ज्यौं चकोर रति मान॥ [2]
क्रीडा रस-बस भए मगन, (दोउ) मनसिज गयौ लजान।
‘कृष्णदास’ प्रभु गोवर्द्धनधर, ब्रजजन-जीवन-प्रान॥ [3]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (665)

श्री श्यामा-श्याम निकुंज में विराजमान हैं। उनके चारों ओर मालती, माधवी और विविध प्रकार के सुंदर पुष्प खिले हुए हैं, जिससे वह संपूर्ण धाम अत्यंत सुशोभित हो रहा है। [1]

ललिता और विशाखा सखी-सहचरियाँ मधुर स्वर में गान कर रही हैं। वे परम आनंदित होकर युगल सरकार के प्रफुल्लित मुखारविंद को इस प्रकार निहार रही हैं, जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा को अत्यंत प्रेमपूर्वक निहारता है। [2]

दोनों प्रिया-प्रियतम क्रीड़ा-रस के वशीभूत होकर पूर्णतः मग्न हैं, जिनकी इस अलौकिक प्रीति को देखकर साक्षात कामदेव भी लज्जित हो गया है। श्री कृष्णदास जी कहते हैं कि मेरे प्रभु गोवर्धनधारी श्री कृष्ण एवं श्री राधा जू ही समस्त ब्रजवासियों के जीवन और प्राण हैं। [3]