निरगुन अविनासी मत, कहा आनि भाष्यौ।
सूरदास जीवन-धन, कान्ह कहाँ राख्यौ॥
- श्री सूरदास, सूर सागर (4215.5)
अरे उद्धव! हम ब्रजांगनाएँ तो प्रेममार्ग की उपासिकाएँ हैं और तुम ब्रज में आकर हमें ही अविनाशी निर्गुण ब्रह्म का ज्ञान सुनाना चाहते हो, जो हमें कदापि स्वीकार नहीं है। अतः तुम पहले यह बताओ कि सूरदास जी के स्वामी और हमारे जीवन-धन श्रीकृष्ण को कहाँ छोड़ आए हो? अच्छा तो यही होगा कि तुम उन्हें यहाँ हमारे पास ले आओ।
सूरदास जीवन-धन, कान्ह कहाँ राख्यौ॥
- श्री सूरदास, सूर सागर (4215.5)
अरे उद्धव! हम ब्रजांगनाएँ तो प्रेममार्ग की उपासिकाएँ हैं और तुम ब्रज में आकर हमें ही अविनाशी निर्गुण ब्रह्म का ज्ञान सुनाना चाहते हो, जो हमें कदापि स्वीकार नहीं है। अतः तुम पहले यह बताओ कि सूरदास जी के स्वामी और हमारे जीवन-धन श्रीकृष्ण को कहाँ छोड़ आए हो? अच्छा तो यही होगा कि तुम उन्हें यहाँ हमारे पास ले आओ।

