तत्समो नास्ति तीर्थोऽन्यो न च वैकुण्ठ एव च।
किमन्यैस्तीर्थगणैरन्धकूपसमाः मुने॥
- सनत्कुमार संहिता (32.1)
हे मुनि! ब्रज-वृंदावन के समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं है। यहाँ तक कि वैकुण्ठ भी उसकी समानता नहीं कर सकता, फिर अन्य तीर्थों की तो बात ही क्या! इस धाम की तुलना में वे सभी अंधे कुओं के समान हैं।
किमन्यैस्तीर्थगणैरन्धकूपसमाः मुने॥
- सनत्कुमार संहिता (32.1)
हे मुनि! ब्रज-वृंदावन के समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं है। यहाँ तक कि वैकुण्ठ भी उसकी समानता नहीं कर सकता, फिर अन्य तीर्थों की तो बात ही क्या! इस धाम की तुलना में वे सभी अंधे कुओं के समान हैं।

