(कवित्त)
तालन पै, ताल पै, तमालन पै, मालन पै,
वृंदावन-बीथिन बिहार बंसीबट पै। [1]
कहै 'पद्माकर' अखंड रास-मंडल पै,
मंडित उमंड महा कालिंदी के तट पै॥ [2]
छिति पर, छान पर, छज्जत छटान पर,
ललित लतान पर, लाड़िली के लट पै। [3]
आई, भलै छाई, ये सरद-जुन्हाई,
जिहि पाई छबि आजही कन्हाई के मुकुट पै॥ [4]
- श्री पद्माकर
शरद ऋतु की उज्ज्वल चाँदनी सरोवरों पर, ताल एवं तमाल के वृक्षों पर, मालाओं पर, वृंदावन की गलियों में तथा विहार-स्थल बंशीवट पर सर्वत्र फैल गई है। [1]
कवि पद्माकर कहते हैं कि यह अलौकिक चाँदनी संपूर्ण रास-मंडल पर और श्री यमुना जी के पावन तट पर अत्यंत उमड़-घुमड़कर सुशोभित हो रही है। [2]
यह पृथ्वी पर, छप्परों पर, छज्जों की कांति पर, सुंदर लताओं पर और श्री लाड़िली जी की केश-लटों पर बिखरी हुई है। [3]
यह शरद पूर्णिमा की चाँदनी अत्यंत सुंदर ढंग से सब ओर छा गई है, परंतु इसे अपनी परम शोभा आज श्रीकृष्ण के मुकुट पर आकर ही प्राप्त हुई है। [4]
तालन पै, ताल पै, तमालन पै, मालन पै,
वृंदावन-बीथिन बिहार बंसीबट पै। [1]
कहै 'पद्माकर' अखंड रास-मंडल पै,
मंडित उमंड महा कालिंदी के तट पै॥ [2]
छिति पर, छान पर, छज्जत छटान पर,
ललित लतान पर, लाड़िली के लट पै। [3]
आई, भलै छाई, ये सरद-जुन्हाई,
जिहि पाई छबि आजही कन्हाई के मुकुट पै॥ [4]
- श्री पद्माकर
शरद ऋतु की उज्ज्वल चाँदनी सरोवरों पर, ताल एवं तमाल के वृक्षों पर, मालाओं पर, वृंदावन की गलियों में तथा विहार-स्थल बंशीवट पर सर्वत्र फैल गई है। [1]
कवि पद्माकर कहते हैं कि यह अलौकिक चाँदनी संपूर्ण रास-मंडल पर और श्री यमुना जी के पावन तट पर अत्यंत उमड़-घुमड़कर सुशोभित हो रही है। [2]
यह पृथ्वी पर, छप्परों पर, छज्जों की कांति पर, सुंदर लताओं पर और श्री लाड़िली जी की केश-लटों पर बिखरी हुई है। [3]
यह शरद पूर्णिमा की चाँदनी अत्यंत सुंदर ढंग से सब ओर छा गई है, परंतु इसे अपनी परम शोभा आज श्रीकृष्ण के मुकुट पर आकर ही प्राप्त हुई है। [4]

