प्यारी तू अद्भुत छबि की - श्री रूप सखी जी,श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (181)

प्यारी तू अद्भुत छबि की - श्री रूप सखी जी,श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (181)

प्यारी तू अद्भुत छबि की रासि।
कोटिनि सरद इंदु बलिहारी, सुंदर बदन प्रकासि॥ [1]
सुधासनी मुसक्यान मनोहर, फूली कली सुवासि।
इकटक निरखै रसिक बिहारी, रूप रंग कौ दासि॥ [2]

- श्री रूप सखी जी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (181)

हे प्यारी जी (श्रीराधाजू)! आप अद्भुत रूप-सौंदर्य की राशि हैं। आपके अत्यंत मनोहर मुखारविंद की दिव्य आभा पर शरद पूर्णिमा के करोड़ों चंद्रमा भी न्योछावर हैं। [1]

आपकी मनमोहक मुस्कान अमृत-रस से परिपूर्ण है, जो सुगंधित पुष्प की खिली हुई कली के समान आनंददायिनी है। श्रीरूप सखी जी, जो आपकी अलौकिक छवि के रस-विलास की दासी हैं, कहती हैं कि आपके इस अनुपम रूप-सौंदर्य का रसपान करते हुए रसिक शिरोमणि श्रीबाँकेबिहारी जी भी एकटक निरंतर आपको ही निहारते रहते हैं। [2]