अब तो राधा चरन मन - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (146)

अब तो राधा चरन मन - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (146)

(राग पीलू, त्रिताल)
अब तो राधा चरन मन दीनौ।
कुंवरि किशोरी प्रिया पियारी, अपनी कर मोहे लीनौ॥ [1]
श्रीवृन्दावन रानी राधा, महलन दासी कीनौ।
श्रीगोपालहित हरी स्वामिनी, हित सजनी ने चीनौ॥ [2]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (146)

अब मेरा मन पूर्णतः श्री राधाजू के चरणों में समर्पित हो गया है। कुँवरि किशोरी, श्री प्रिया जू ने कृपा करके मुझे अपना बना लिया है। [1]

श्री वृन्दावन की महारानी श्री राधा ने मुझे अपने दिव्य महल की दासी स्वीकार कर लिया है। श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि श्री राधा की परम अंतरंग हित सजनी (श्री हरिवंश महाप्रभु) ने मुझे अपना मान कर पहचान लिया है और उनकी कृपा से मुझे भी श्री राधा की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। [2]