कबकी टेरत दीन ह्वै, सुनत न नाथ पुकार।
की सरवन ऊँची सुनो, की बिर्द दियो बिसार॥
- श्री दयाबाई
हे नाथ! यह दीन जीव न जाने कब से आपको पुकार रहा है, किंतु आप मेरी पुकार सुन ही नहीं रहे हैं। क्या आपके कान ऊँचा सुनने लगे हैं, अथवा आपने दीनों पर दया करने का अपना सहज स्वभाव (विरद) ही भुला दिया है?
की सरवन ऊँची सुनो, की बिर्द दियो बिसार॥
- श्री दयाबाई
हे नाथ! यह दीन जीव न जाने कब से आपको पुकार रहा है, किंतु आप मेरी पुकार सुन ही नहीं रहे हैं। क्या आपके कान ऊँचा सुनने लगे हैं, अथवा आपने दीनों पर दया करने का अपना सहज स्वभाव (विरद) ही भुला दिया है?

