गुन रूपकी अवधि राधिका - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (128)

गुन रूपकी अवधि राधिका - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (128)

(राग कल्याण)
गुन रूपकी अवधि राधिका तैं रसिक राइसिरोमनि वस कियौ।
तनु मनु धनु जोवनु भूषन प्रानप्यारे कैं और न वियौ॥ [1]
बोलत हँसत मिलत चितवत ही मोहन कौ चित चोरि लियौ।
नवनिकुंज वृंदावन विहरत सीतल करत व्यासकौ हियौ॥ [2]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (128)

गुण और सौंदर्य की पराकाष्ठा श्री राधिकाजू ने रसिक-शिरोमणि श्रीकृष्ण को पूर्णतः अपने वश में कर लिया है। श्रीकृष्ण का तन, मन, धन, यौवन, आभूषण और प्राण—सब कुछ उनकी प्राणप्रिया श्रीराधाजी के लिए ही समर्पित है। [1]

श्रीराधा अपनी मधुर वाणी, मनमोहक मुस्कान, प्रेमपूर्ण मिलन और चितवन मात्र से श्रीमोहन का चित्त चुरा लेती हैं। श्रीधाम वृंदावन के नवीन निकुंजों में नित्य विहार करती हुई वे श्री हरिराम व्यासजी के हृदय को परम शीतलता प्रदान करती हैं। [2]