निरतत रसिक सदा उजियारी।
थेई थेई वदत हरत जुवतिन मन, कोटि मदनमदहारी॥ [1]
शीशमुकुट मकराकृत कुंडल, उपमा रही विचारी।
भृकुटी धनुष नैन खंजनवर, अलक लटक घुंघरारी॥ [2]
अलक कपोल नासिक मुक्ता, अधर दशन छबि भारी।
चिबुतिल मनोशरणतम आयो, रामसखी बलिहारी॥ [3]
- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण सदा परम उज्ज्वल कांति से प्रकाशित होकर नृत्य कर रहे हैं। वे 'थेई-थेई' शब्द का मधुर उच्चारण करते हुए समस्त ब्रज-युवतियों के मन का हरण कर लेते हैं तथा करोड़ों कामदेवों के मद का नाश करने वाले हैं। [1]
उनके शीश पर सुंदर मुकुट और कानों में मकराकृत कुंडल सुशोभित हैं, जिनकी अनुपम शोभा देखकर बुद्धि भी उपमा ढूँढने में विचारमग्न रह जाती है। उनकी भृकुटी धनुष के समान, नयन श्रेष्ठ खंजन पक्षी के समान हैं तथा घुंघराली अलकें मुखमंडल पर लटक रही हैं। [2]
कपोलों पर लटकती अलकें, नासिका की सुंदर मुक्ता, तथा अधरों और दंतपंक्ति की भारी छवि अत्यंत शोभायमान है। उनकी ठोड़ी पर स्थित तिल ऐसा लगता है मानो अंधकार भी उनकी शरण में आ गया हो। श्री रामसखीजी इस अद्भुत सौंदर्य पर स्वयं को बलिहार करते हैं। [3]
थेई थेई वदत हरत जुवतिन मन, कोटि मदनमदहारी॥ [1]
शीशमुकुट मकराकृत कुंडल, उपमा रही विचारी।
भृकुटी धनुष नैन खंजनवर, अलक लटक घुंघरारी॥ [2]
अलक कपोल नासिक मुक्ता, अधर दशन छबि भारी।
चिबुतिल मनोशरणतम आयो, रामसखी बलिहारी॥ [3]
- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण सदा परम उज्ज्वल कांति से प्रकाशित होकर नृत्य कर रहे हैं। वे 'थेई-थेई' शब्द का मधुर उच्चारण करते हुए समस्त ब्रज-युवतियों के मन का हरण कर लेते हैं तथा करोड़ों कामदेवों के मद का नाश करने वाले हैं। [1]
उनके शीश पर सुंदर मुकुट और कानों में मकराकृत कुंडल सुशोभित हैं, जिनकी अनुपम शोभा देखकर बुद्धि भी उपमा ढूँढने में विचारमग्न रह जाती है। उनकी भृकुटी धनुष के समान, नयन श्रेष्ठ खंजन पक्षी के समान हैं तथा घुंघराली अलकें मुखमंडल पर लटक रही हैं। [2]
कपोलों पर लटकती अलकें, नासिका की सुंदर मुक्ता, तथा अधरों और दंतपंक्ति की भारी छवि अत्यंत शोभायमान है। उनकी ठोड़ी पर स्थित तिल ऐसा लगता है मानो अंधकार भी उनकी शरण में आ गया हो। श्री रामसखीजी इस अद्भुत सौंदर्य पर स्वयं को बलिहार करते हैं। [3]

