कहा बुद्धि कहा कहि सकूँ - श्री चरणदास

कहा बुद्धि कहा कहि सकूँ - श्री चरणदास

कहा बुद्धि कहा कहि सकूँ, रास केलि कौ साज।
अद्भुत लीला ह्वै रही, वर्णत आवै लाज॥

- श्री चरणदास

श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य रास-केलि की मनोहर प्रेममयी क्रीड़ा का वर्णन करने में मेरी बुद्धि कहाँ समर्थ है? वहाँ ऐसी अद्भुत और अनुपम लीलाएँ हो रही हैं कि उनका वर्णन करने में अपनी असमर्थता का अनुभव कर मुझे लज्जा आती है।