(राग कान्हरौ)
तू सुनि कान दैरी मुरली, तेरे गुन गावै स्याम कुंज-भवन।
सनमुख होइ करि, ताहि कौं आँकौ भरि,
सो तन परसि आवै जो पबन॥ [1]
तेरौई ध्यान धरति उर अंतर नैन मूँदि,
निकसति उर डरपत, तेरौई आगम सुनि स्रबनन।
'सूरदास मदनमोहन' सौं तू चलि मिलि,
तोही तें पायौ नाम राधा-रमन॥ [2]
- श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत), श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (121)
हे राधे! तुम कान लगाकर मुरली की धुन सुनो, कुंज-भवन में श्रीश्यामसुंदर तुम्हारे ही गुणों का गान कर रहे हैं। जो पवन तुम्हारे श्रीअंग का स्पर्श करके आती है, वे उसके सम्मुख होकर उसे प्रेमपूर्वक अपने हृदय से लगा लेते हैं। [1]
श्रीश्यामसुन्दर अपने हृदय में निरन्तर तुम्हारा ही ध्यान करते रहते हैं। नेत्र बन्द करके तुम्हारे स्वरूप का चिन्तन करते हैं और इस भय से उस ध्यान से बाहर नहीं आना चाहते कि कहीं तुम्हारी मनोहर छवि उनसे ओझल न हो जाए। किन्तु जैसे ही उनके कानों में तुम्हारे आगमन का समाचार पड़ता है, वे प्रेम से व्याकुल हो उठते हैं। श्रीसूरदास जी कहते हैं—हे श्रीराधे! तुम जाकर अपने प्रियतम मदनमोहन से मिलो, क्योंकि तुम्हारे ही कारण उन्हें ‘राधारमण’ का मधुर नाम प्राप्त हुआ है। [2]
तू सुनि कान दैरी मुरली, तेरे गुन गावै स्याम कुंज-भवन।
सनमुख होइ करि, ताहि कौं आँकौ भरि,
सो तन परसि आवै जो पबन॥ [1]
तेरौई ध्यान धरति उर अंतर नैन मूँदि,
निकसति उर डरपत, तेरौई आगम सुनि स्रबनन।
'सूरदास मदनमोहन' सौं तू चलि मिलि,
तोही तें पायौ नाम राधा-रमन॥ [2]
- श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत), श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (121)
हे राधे! तुम कान लगाकर मुरली की धुन सुनो, कुंज-भवन में श्रीश्यामसुंदर तुम्हारे ही गुणों का गान कर रहे हैं। जो पवन तुम्हारे श्रीअंग का स्पर्श करके आती है, वे उसके सम्मुख होकर उसे प्रेमपूर्वक अपने हृदय से लगा लेते हैं। [1]
श्रीश्यामसुन्दर अपने हृदय में निरन्तर तुम्हारा ही ध्यान करते रहते हैं। नेत्र बन्द करके तुम्हारे स्वरूप का चिन्तन करते हैं और इस भय से उस ध्यान से बाहर नहीं आना चाहते कि कहीं तुम्हारी मनोहर छवि उनसे ओझल न हो जाए। किन्तु जैसे ही उनके कानों में तुम्हारे आगमन का समाचार पड़ता है, वे प्रेम से व्याकुल हो उठते हैं। श्रीसूरदास जी कहते हैं—हे श्रीराधे! तुम जाकर अपने प्रियतम मदनमोहन से मिलो, क्योंकि तुम्हारे ही कारण उन्हें ‘राधारमण’ का मधुर नाम प्राप्त हुआ है। [2]

