मो मन गड्यौ स्याम सलोने - श्री नन्ददास

मो मन गड्यौ स्याम सलोने - श्री नन्ददास

मो मन गड्यौ स्याम
सलोने रूपमें अंग-अंगनि तर्यो। [1]
ऐसो लटू ह्वै लटक्यो बहुरि न
मटक्यो अनेक जतन जो कर्यो॥ [2]
ज्यों-ज्यों ऐचौं त्यों-त्यों अधिक मगन
होत का पै जात निकर्यो। [3]
'नंददास' तू सिख दै री अली! अली
सब कैसे निकसे कुञ्ज-रचना तरै परयो॥ [4]

- श्री नन्ददास

एक सखी अन्य सखी से कहती है—

हे सखी! मेरा मन श्रीकृष्ण के अत्यन्त मनोहर साँवले स्वरूप में ऐसा रम गया है कि उनके अंग-प्रत्यंग की अनुपम शोभा में पूर्णतः डूबकर उसी में मग्न हो रहा है। [1]

उनके दिव्य रूप पर यह मन ऐसा लट्टू होकर मोहित हो गया है कि अनेक प्रयत्न करने पर भी फिर किसी प्रकार वहाँ से हटता ही नहीं। [2]

मैं इसे जितना अधिक वहाँ से खींचकर अलग करने का प्रयास करती हूँ, यह उतना ही अधिक उस रूप-रस में मग्न होता जाता है और किसी प्रकार भी वहाँ से बाहर नहीं निकलता। [3]

श्री नन्ददासजी वर्णन करते हैं कि फिर वे सखी से कहती है—अब तू ही बता, मैं क्या उपाय करूँ? मेरा मन श्रीकृष्ण के उस मनोहर निकुञ्ज-विहारी स्वरूप की अद्भुत छवि में ऐसा फँस गया है कि अब भला वहाँ से कैसे निकल सकता है? [4]