किया था गोपियों ने यहीं - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (23)

किया था गोपियों ने यहीं - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (23)

(कवित्त)
किया था गोपियों ने यहीं तो कात्यायनी व्रत,
चंचल चित्त चोर की चाह भरी चाट पै। [1]
प्रेम में विभोर उसे देख नहीं होता कौन?
कौन नहीं जाता बिक जाके प्रेम हाट पै॥ [2]
बारि डारौ हरेकृष्ण! कल्पतरु कोटि कोटि,
एक ही कदम्ब के विचित्र टाटवाट पै। [3]
देख कर चीर बँधे जान यही पड़ता है,
आता है चुराने श्याम चीर चीरघाट पै॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (23)

गोपियों ने मन को चुराने वाले चंचल श्रीकृष्ण को पाने की तीव्र लालसा में इसी श्रीधाम वृन्दावन में श्री कात्यायनी देवी का व्रत किया था। [1]

इस श्रीधाम को निहारकर ऐसा कौन होगा जो प्रेम में भावविभोर नहीं हो जाएगा? भगवान् के द्वारा रचित इस प्रेम-बाज़ार में जाकर भला कौन स्वयं को न्योछावर नहीं कर देगा? [2]

श्री हरेकृष्ण कहते हैं कि इस चीरघाट के केवल एक ही कदम्ब वृक्ष की विचित्र शोभा और वैभव पर करोड़ों-करोड़ों कल्पवृक्षों को भी न्योछावर किया जा सकता है। [3]

यहाँ कदम्ब पर बँधे वस्त्रों को देखकर आज भी यही प्रतीत होता है मानो श्यामसुंदर स्वयं इस चीरघाट पर वस्त्र चुराने के लिए पधारते हैं। [4]