सा वै सुमाता च पिता स एव स एव बन्धुश्च सखा स एव
सः एव देवो मम वन्दनीयो वृन्दावने न्बादिशते निवेष्टुम्॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.45)
जो श्रीवृन्दावन में वास करने के लिए आदेश दे, वही मेरी सुमाता है तथा वही मेरा पिता, वही बन्धु, वही सखा और वही मेरा वन्दनीय देवता है।
सः एव देवो मम वन्दनीयो वृन्दावने न्बादिशते निवेष्टुम्॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.45)
जो श्रीवृन्दावन में वास करने के लिए आदेश दे, वही मेरी सुमाता है तथा वही मेरा पिता, वही बन्धु, वही सखा और वही मेरा वन्दनीय देवता है।

